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CBSE 10वीं गणित की परीक्षा: छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ या आर्थिक बोझ का नया जाल? – ​लेखक: अशोक कुमार, अम्बा विहार मु. नगर

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भूमिका:

हाल ही में संपन्न हुई CBSE कक्षा 10वीं की गणित (Mathematics) की परीक्षा ने छात्रों और अभिभावकों के बीच एक नई और गंभीर बहस छेड़ दी है। इस वर्ष की परीक्षा प्रणाली में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है—’दो बोर्ड परीक्षाओं’ की नई व्यवस्था। हालांकि प्रशासन इसे सुधार का नाम दे रहा है, लेकिन धरातल पर यह नीति कई कड़वे सवाल खड़े करती है। क्या यह वास्तव में शिक्षा में सुधार है, या फिर छात्रों के भविष्य के साथ एक नया प्रयोग?

करियर के साथ खिलवाड़:

गणित जैसे महत्वपूर्ण विषय में जिस तरह के प्रश्नपत्र और नई नीति सामने आ रही है, वह छात्रों के करियर के साथ एक प्रकार का खिलवाड़ साबित हो सकती है। यदि प्रथम चरण की बोर्ड परीक्षा (First Board) का स्तर जानबूझकर अत्यधिक कठिन रखा जाता है, तो इसका सीधा असर छात्र के आत्मविश्वास और उसके भविष्य के विकल्पों पर पड़ता है। कम अंकों का डर छात्रों को मानसिक रूप से तोड़ देता है और उन्हें अपनी योग्यता पर संदेह होने लगता है। क्या हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं जो केवल अंकों और परीक्षाओं के फेर में ही उलझी रहे?

अभिभावकों की जेब पर प्रहार:

इस नई व्यवस्था का सबसे चिंताजनक और कड़वा सच इसका आर्थिक पहलू है। नियम के मुताबिक, यदि छात्र पहले बोर्ड के अंकों से संतुष्ट नहीं है या असफल होता है, तो उसे दूसरे बोर्ड (Second Board) में बैठने के लिए पुनः आवेदन करना होगा। यह सीधे तौर पर अभिभावकों की जेब पर एक बड़ा प्रहार है।

आज के महंगाई के दौर में, जहां अभिभावक पहले से ही भारी-भरकम स्कूल फीस और ट्यूशन के खर्च से दबे हुए हैं, वहां बार-बार ‘परीक्षा शुल्क’ (Examination Fee) का बोझ डालना किसी भी दृष्टिकोण से न्यायसंगत नहीं लगता। यदि बड़ी संख्या में छात्रों को कम अंक देकर दोबारा फॉर्म भरने पर विवश किया जाता है, तो यह व्यवस्था शिक्षा के ‘लोककल्याण’ के बजाय एक ‘व्यावसायिक रणनीति’ की ओर झुकी हुई प्रतीत होती है।

पारदर्शिता की आवश्यकता:

CBSE को यह सुनिश्चित करना होगा कि गणित जैसे कठिन विषय में मूल्यांकन (Evaluation) और प्रश्नपत्रों का स्तर पूरी तरह पारदर्शी हो। ऐसा न हो कि ‘बेहतर अवसर’ के नाम पर छात्रों को दोबारा परीक्षा शुल्क भरने के लिए अप्रत्यक्ष रूप से मजबूर किया जाए। शिक्षा का उद्देश्य छात्र का सर्वांगीण विकास होना चाहिए, न कि उसे एक ‘राजस्व संग्रह’ (Revenue Generation) का माध्यम बनाना।

निष्कर्ष:

समय आ गया है कि शिक्षा मंत्रालय और बोर्ड इस पर गंभीरता से पुनर्विचार करें। कोई भी नीति तभी सफल मानी जाएगी जब वह छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा करे और अभिभावकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ न डाले। शिक्षा के नाम पर ‘फीस का खेल’ बंद होना चाहिए और छात्रों के उज्जवल भविष्य के लिए एक स्थिर और सहायक वातावरण तैयार किया जाना चाहिए।

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