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Yes Milord: Romeo & Juliet क्लॉज़ क्या है? POCSO Act इससे हो जाएगा कमजोर

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विलियम शेक्सपियर के मशहूर नाटक रोमियो एंड जूलियट की कहानी तो आपने सुनी ही होगी। वे दो ऐसे स्टार क्रॉस प्रेमी थे जिनके परिवार एक दूसरे के कट्टर दुश्मन थे। मोहब्बत सच्ची थी लेकिन परिवारों के बीच ऐसी दुश्मनी थी कि आखिर में दोनों प्रेमी मौत को गले लगा लेते हैं। आज सदियों बाद भारत की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट के गलियारों में फिर से रोमियो एंड जूलियट का नाम गूंज रहा है। कारण इलाहाबाद हाईकोर्ट का एक फैसला जिसमें यौन शोषण से जुड़े एक मामले में अदालत ने लड़के को रिहा कर दिया क्योंकि लड़की की ओर से बताई जा रही उम्र और उसके स्कूल के सर्टिफिकेट में काफी अंतर था। यह फैसला यूपी सरकार को ठीक नहीं लगा। उसे लगा कि मामला पोक्सो एक्ट का है और इसी के तहत फैसला सुनाया जाना चाहिए था। ऐसे में यूपी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील की। जिसे सुनते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिए। समाज की सच्चाई और कागजों की सच्चाई में फर्क को समझा और क्लॉज़ इंट्रोड्यूस किया रोमियो जूलियट क्लॉज़। यह रोमियो जूलियट क्लॉज़ की जरूरत क्या है? और यह है क्या? यह किस तरह काम करेगा? पोक्सो एक्ट पहले कैसा था? अब इस क्लॉज़ के जुड़ने के बाद कैसा हो जाएगा?

क्या है पूरा मामला

पूरी कहानी उत्तर प्रदेश के शामली के एक मामले से शुरू होती है। आरोप था कि नाबालिक लड़की से एक शख्स ने कई बार रेप किया और कट्टे के दम पर उसके अश्लील वीडियो बना लिए जिसके जरिए वो लड़की को ब्लैकमेल भी करता था। इस ब्लैकमेलिंग के दम पर वो 6 महीने तक नाबालिक लड़की से रेप करता रहा। 2 दिसंबर 204 को मामले में एफआईआर लिखी गई। मामला सेशन कोर्ट में गया जहां आरोपी की जमानत याचिका खारिज कर दी गई। मगर अप्रैल 2025 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कुछ तर्कों के साथ आरोपी को जमानत दे दी। जैसे लड़की की उम्र कंफर्म नहीं थी। माने वो 18 साल से ज्यादा हो सकती थी। यानी पॉक्सो एक्ट नहीं लगता। हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि पॉक्सो एक्ट के हर केस में जांच की शुरुआत में ही पीड़ित का मेडिकल एज डिटरमिनेशन टेस्ट यानी उम्र तय करने वाली डॉक्टरी जांच अनिवार्य रूप से कराई जाए और उसकी रिपोर्ट बेल की सुनवाई के दौरान कोर्ट में पेश की जाए। यूपी सरकार इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चली गई।

 

सुप्रीम कोर्ट बोला- किशोरों की भलाई के लिए कदम

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन कानूनों का इस्तेमाल केवल बच्चों को यौन शोषण से बचाने के लिए ही नहीं किया जा रहा है, बल्कि किशोरों के बीच वास्तविक सहमति से बने संबंधों के मामलों में भी इनका प्रयोग किया जा रहा है। कोर्ट ने यह भी कहा कि परिवार अक्सर इन संबंधों का विरोध करते हैं और कई मामलों में किशोरों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज कराते हैं।

 

सुरक्षा बनाम व्यक्तिगत स्वतंत्रता

पीओसीएसओ अधिनियम के तहत, 18 वर्ष से कम आयु के किसी भी व्यक्ति को बच्चा माना जाता है। यह अधिनियम यौन कृत्यों के लिए नाबालिग की सहमति को मान्यता नहीं देता है। इसलिए, 18 वर्ष से कम आयु के किसी भी व्यक्ति से संबंधित कोई भी यौन गतिविधि स्वतः ही अपराध मानी जाती है, चाहे वह सहमति से हो या शोषणकारी न हो। अपने फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि पीओसीएसओ न्याय का एक गंभीर निरूपण है, लेकिन इसके दुरुपयोग ने “समाज में एक गंभीर खाई पैदा कर दी है। न्यायालय ने बताया कि इस अधिनियम का अक्सर परिवारों द्वारा युवाओं के बीच संबंधों का विरोध करने के लिए उपयोग किया जाता है।

परिवर्तन की मांग

कानून में संशोधन की मांग नई नहीं है, लेकिन यौन अपराधों के अभियोजन में महिलाओं के लिए सुरक्षा और बचाव से संबंधित सर्वोच्च न्यायालय में लंबित एक जनहित याचिका के कारण इसे बल मिला है। इस मामले में, न्यायालय की सहायक अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने सहमति की आयु को कम करने या अपवादों को शामिल करने की वकालत की है। पिछले वर्ष दायर अपनी लिखित दलीलों में जयसिंह ने तर्क दिया कि वर्तमान व्यापक अपराधीकरण संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 के तहत किशोरों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। उन्होंने कहा कि 16 से 18 वर्ष की आयु के किशोरों में अपनी यौन स्वायत्तता के संबंध में निर्णय लेने की “विकसित होती क्षमता” होती है। सामान्य कानून के परिपक्व नाबालिग सिद्धांत का हवाला देते हुए, उन्होंने तर्क दिया कि 18 वर्ष से कम आयु के सभी लोगों को सहमति देने में असमर्थ मानना वैज्ञानिक वास्तविकता और यौवन की जैविक शुरुआत की अनदेखी है। जयसिंह ने आयु में निकट अपवाद का प्रस्ताव रखा। इस कानूनी व्यवस्था के तहत, यदि दोनों पक्ष किशोर हैं उदाहरण के लिए, एक 16 वर्षीय और एक 17 वर्षीय और यह कृत्य आपसी सहमति से हुआ है, तो इसे अपराध नहीं माना जाएगा। इससे बिना किसी दबाव के बने संबंधों के लिए युवा लड़कों को पीओसीएसओ अधिनियम के तहत कारावास से बचाया जा सकेगा।

 

सरकार का यथास्थिति बनाए रखने का रुख

केंद्र सरकार ने सहमति की आयु में किसी भी प्रकार की कमी या विधायी अपवादों के लागू होने का विरोध किया है। इस मामले में अदालत के समक्ष अपनी दलीलों में सरकार ने तर्क दिया कि 18 वर्ष की आयु एक “सोच-समझकर लिया गया” विधायी निर्णय है, जिसका उद्देश्य बच्चों के लिए एक अप्रतिबंधित सुरक्षा कवच बनाना है। सरकार का तर्क था कि नाबालिगों में सार्थक सहमति देने की कानूनी और विकासात्मक क्षमता नहीं होती। उसने कहा कि एक सख्त जवाबदेही ढांचा—जहां सहमति का कोई महत्व नहीं है, आवश्यक है, क्योंकि बच्चे भरोसेमंद पदों पर बैठे वयस्कों द्वारा हेरफेर और दबाव के शिकार हो सकते हैं। सरकार ने आशंका व्यक्त की कि अपवाद लागू करने या सहमति की उम्र कम करने से सहमतिपूर्ण संबंधों की आड़ में बाल शोषण और तस्करी के लिए रास्ते खुल सकते हैं। चूंकि यह अधिनियम बाल शोषण की विशिष्ट समस्या के निवारण के लिए बनाया गया था, इसलिए आयु सीमा को कम करने से वही समस्या फिर से उत्पन्न हो जाएगी जिसे हल करने का प्रयास इस कानून ने किया था।

 

 

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