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महाष्टमी व्रत करने से जीवन में आती है खुशहाली और सम्पन्नता

महाष्टमी व्रत करने से जीवन में आती है खुशहाली और सम्पन्नता

आज दुर्गाष्टमी है, इस मां दुर्गा की पूजा कर कन्याओं को भोज कराने का विधान है, तो आइए हम आपको महाष्टमी व्रत से पूजा विधि एवं महत्व के बारे में बताते हैं।

जानें महाष्टमी के बारे में

नवरात्र के आठवें दिन अष्टमी को महाष्टमी का कहा जाता है। महाष्टमी का त्यौहार हमारे देश में बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। अष्टमी का दिन कुल देवी का माना जाता है इसलिए घर की कुल देवी की पूजा की जाती है। अष्टमी को मां काली, दक्षिण काली, भद्रकाली और महाकाली की भी अराधना की जाती है। महाष्टमी के दिन दुर्गा मां के रूप महागौरी की पूजा की जाती है। पंडितों का मानना है कि माता अष्टमी की पूजा करने से हर प्रकार की सिद्धियों पर जीत प्राप्त होती है। महाष्टमी के दिन मां दुर्गा के सामने नौ कलश स्थापित किए जाते हैं। उन नौ कलशों में देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है।

महाष्टमी का शुभ मुहूर्त

महाअष्टमी के तिथि की शुरुआत 2 अक्टूबर 2022 को शाम 06 बजकर 47 मिनट से हो जाएगी। वहीं, इसका समापन 3 अक्टूबर 2022 को शाम 4 बजकर 37 मिनट पर है। इस दिन शोभन योग 2 अक्टूबर शाम 5 बजकर 14 मिनट से 3 अक्टूबर दोपहर 2 बजकर 21 मिनट तक रहेगा। वहीं, संधि पूजा का मुहूर्त 3 अक्टूबर शाम 4 बजकर 14 मिनट से 5 बजकर 2 मिनट तक होगा।

ऐसे करें पूजा

अष्टमी के दिन मां दुर्गा की भी पूजा होती है। अष्टमी के दिन सबसे पहले प्रातः स्नान करके खुद को शुद्ध कर लें फिर पूजा आरम्भ करें। साथ ही इस दिन संधि पूजा का प्रावधान होता है जो अष्टमी और नवमी दोनों दिन चलती है।

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हवन पूजा का है खास महत्व

सबसे पहले हवन कुंड को गंगाजल से शुद्ध करें। इसके बाद हवन कुंड के चारों तरफ कलावा बांधकर उस पर स्वास्तिक बनाकर पूजा करें। ये करने के बाद हवन कुंड पर अक्षत, फूल और चंदन अर्पित करें। इसके बाद कुंड में घी, शक्कर, चावल और कपूर डालें, फिर हवन कुंड में पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण दिशा की ओर 4 आम की लकड़ी रखें।

कन्या भोज भी है जरूरी

माता महागौरी अन्नपूर्णा का रूप हैं। इस दिन माता अन्नपूर्णा की भी पूजा होती है इसलिए अष्टमी के दिन कन्या भोज और ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है। भोजन में छोला, पूड़ी, हलवा और खीर का भोग माता को लगाया जाता है उसके बाद कन्याओं और ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है। कन्या पूजन को कुमारी पूजन और कन्जक पूजन भी कहा जाता है। इस दिन छोटी लड़कियों का श्रृंगार कर उनकी मां दुर्गा के रूप में पूजा की जाती है। हिन्दू मान्यता के हिसाब से इस पूजा में 2 साल से 10 साल की लड़कियों को ही चुना जाता है। देवी को अष्टमी पर लाल चुनरी में 5 प्रकार के फल, मिठाई, पंचमेवा, एक सिक्का रखकर अर्पित करें. कहते हैं इससे मां अंबे बहुत खुश होती हैं और सुख-समृद्धि का वास होता है। दुर्गाष्टमी पर मां महागौरी को हलवा, पूड़ी,चने और नारियल का भोग अति प्रिय है। पंडितों है इससे भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है, साथ ही धन से संबंधित परेशानियां खत्म हो जाती है।

हवन कुंड में आहुति

हवन कुंड में डाली गई सामग्रियों के बीच में पान का पत्ता रखकर उस पर कपूर, लौंग, इलायची, बताशा रखें, फिर अग्नि प्रज्वलित करें, अब मंत्र बोलते हुए हवन सामग्री से अग्नि में आहुति दें। हवन पूर्ण होने के बाद कन्या पूजन करें।

महागौरी की पूजा और सुहाग की रक्षा

अष्टमी के दिन सुहागन औरते अपने अचल सुहाग के लिए मां गौरी को लाल चुनरी जरूर चढ़ाती हैं। गौरी ने कठिन तपस्या के बाद शिवजी को वर के रूप में प्राप्त किया था। मां गोरी का वाहन बैल और उनका शस्त्र त्रिशूल है। माता गौरी की पूजा करने से भक्तों के सभी पाप धुल जाते हैं। अष्टमी के दिन माता गौरी के चित्र के सामने दीपक जलाएं और उन्हें रोली लगाएं। उसके बाद देवी का ध्यान करते हुए पूजा सम्पन्न करें। साथ ही अष्टम पूजन से सुख व समृद्धि की प्राप्ति होती और सभी मनोकामानाएं पूरी हो जाती हैं।

कन्याओं को दें ये चीजें

अष्टमी तिथि को कन्या पूजा किया जाता है। इस दिन कन्या पूजन के दौरान 9 कन्याओं को उनके पसंद का भोज कराने के बाद उनकी जरूरत का कोई भी लाल रंग का सामान जरूर भेंट करें। मान्यता के अनुसार, ऐसा करने से माता रानी की कृपा बनी रहती है। नवरात्रि में महाष्टमी के उपवास का खास महत्व है। शास्त्रों की मान्यता है कि इस दिन व्रत रहने से बच्चे दीर्घायु होते है इसलिए बहुत से लोग अष्टमी के दिन निर्जला व्रत भी रहते हैं।

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